उम्मीद की खिड़की
4 अप्रैल 2001
ये कहानी शुरू होती है अंत से,
अंत एक रिश्ते का,
अंत उस रिश्ते में बसे प्यार का।
उस रोज़ सिर्फ़ प्राचीता ही नहीं टूटी,
बराबर हिस्सों में उसका दिल भी टूटा।
नौकरी के चलते अभिजीत को शहर छोड़कर जाना पड़ा,
उस वक़्त में मोबाइल इतने प्रचलित तो थे नहीं,
और न “लॉन्ग डिस्टेंस” नाम की चीज़ थी।
“अब कब मिलोगे?”
प्राचीता ने पूछा।
“बहुत जल्द…..”
ये कहकर अभिजीत ने एक उम्मीद दी कि शायद
वो फिर मिल पाएँ।
पर काम और ज़िम्मेदारियों में उलझा इंसान
पतंग की तरह हो जाता है,
जिसका एक सहारा तो होता है,
पर वो वहाँ वापस जा नहीं पाता है…
समाज का हिस्सा हो जाने के बाद समय मिलता कहाँ है?
“समय तो निकालना पड़ता है…”
प्राचीता ने कहा।
“तुम ज़्यादा सोच रही हो, लो मेरी ट्रेन भी आ गई।”
अभिजीत चला गया।
प्राचीता वहीं खड़ी ट्रेन को एकटक देखती रही।
उसे अभिजीत का ऐसे जाना
अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
स्टेशन पर अकसर हमें महसूस होता है
पीछे छूटी उन ट्रेनों की उदासी,
ट्रेन गुज़रती तो है
लेकिन रुकती नहीं, जैसे किसी आँधी की तरह गुज़रा प्रेम
और पीछे छोड़ गया एक उदास और खाली मन।
प्राचीता भी अभी यही महसूस कर रही थी।
बस अभिजीत से वापस मिलने की उम्मीद ने उसे बचाए रखा था।
जाने की जल्दी में लोग
अक्सर भूल जाते हैं…
सब कुछ ठीक से बंद करना…
कभी कोई “खिड़की” उम्मीद की,
तो कभी कोई दरवाज़ा इंतज़ार का
ज़रा-सा खुला छोड़ ही जाते हैं…
………….
उम्मीद की खिड़की





