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टूटा खिलौना

तुम्हें ये मिल कहाँ से जाते हैं रोज़ नये–नये?”

“क्योंकि मैं ढूँढता हूँ,” टीनू ने अपने हाथ में एक खराब-सी दिखने वाली गुड़िया पकड़े हुए कहा।
“कहाँ?” सोहन ने पूछा।
“कचरे में,” टीनू मुस्कराया।
यह सुनकर सोहन ने कहा, “तो पूरे दिन तू गली-गली का कचरा देखता घूमता है क्या?”
“नहीं, स्कूल से आते वक्त ढूँढता हूँ,” टीनू बोला।

तभी टीनू की मम्मी आती हुई बोलीं, “कुछ दिन स्कूल मत जा, गर्मी बहुत है, ज़मीन तप रही है, तेरे पैरों में छाले हो गए हैं।”
यह सुनकर सोहन ने पूछा, “क्यों? तेरी चप्पल कहाँ है रे?”
“वो फिर टूट गई, अब सही करने लायक भी नहीं है,” टीनू बोला।

और फिर उसने अपनी चारपाई के नीचे रखे कपड़ों में उस गुड़िया को बाकी खिलौनों के साथ रख दिया — जो उसे कचरे से मिले थे।

टीनू ने आगे कहा, “माँ, मुझे दिक्कत नहीं, पैर अब नहीं जलते, मैं जाऊँगा, मुझे अच्छा लगता है।”
ऐसा कहते हुए टीनू बाहर अपने दोस्तों की तरफ भाग गया।

“आगे कैसे पढ़ेगा ये? गाँव का सरकारी स्कूल भी तो पाँचवीं तक का ही है,” टीनू की माँ ने कहा।
“फिर क्या करेगा? मेरे साथ काम कर लेगा, दुकान पर काम सिखा दूँगा इसे,” सोहन ने कहा।

टीनू भागता हुआ अपने दोस्तों में जा मिला।
“तुझे कल कुछ मिला था क्या?” टीनू ने पूछा।
“हाँ, कल मुझे एक लाइट मिली जो रंग-बिरंगे रंगों में जलती है — इतनी सुंदर!” राजू ने कहा।
“वाह! मुझे एक बार एक बड़ी लाइट मिली थी जिससे रात को रोशनी होती थी,” टीनू ने रोब दिखाते हुए कहा।
ऐसे बातें करते-करते वो मैदान की तरफ चले गए।

शाम को टीनू की माँ घर आईं — वो लोगों के घरों में झाड़ू-पोछे का काम करती थीं।
फिर वो घर का सारा काम देखती थीं।
वो जैसे ही घर में जाने लगीं तो देखा कि टीनू के पापा बाहर बैठे थे।
“क्या हुआ? आप राजू के पापा के साथ डॉक्टर के गए थे, उन्होंने क्या कहा?” तब तक सोहन भी दुकान से लौट आया।

यह सुनकर टीनू के पापा चुप रहे।
“बोलिए पापा… क्या कहा डॉक्टर ने?”
“नहीं हो सकता… उन्होंने कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता।”
“क्या मतलब? अब तो पैसे थे ना!”
“पर अब देर हो गई है, कमला।”

यह सुनकर टीनू की माँ ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं, “बेचारा बच्चा… भगवान को ज़रा भी तरस नहीं आता।”
“शहर के बड़े डॉक्टर को दिखाएँगे।”
“कुछ नहीं होगा कमला, ऐसी बीमारियों का इलाज नहीं, और गरीब के लिए तो भगवान भी कुछ नहीं करता, शहर वाला अस्पताल क्या करेगा।”

यह सुनकर सोहन की माँ फिर रोने लगी।
“अब रो मत, खाना बना ले, टीनू आ जाएगा, भूखा होगा बेचारा…” टीनू के पापा ने कहा और चारपाई पर लेट गए।
सोहन उनके पास बैठ गया।
थोड़ी देर में टीनू भागता हुआ अंदर आया —
“पापा! पापा! आपको पता है, आज रमेश और राजू के सारे कंचे मैंने जीत लिए!”
ऐसा कहकर टीनू ने अपनी जेब से ढेर सारे रंग-बिरंगे कंचे निकाले।

“अरे वाह, बहुत सही!” पापा मुस्कुराए।
“पापा, आप मुझे वो साइकिल कब ठीक करवा के दोगे?”
यह सुनकर सोहन बोला, “क्यों? उसका क्या? अभी नहीं होगा।”
“तो कब, पापा? वो साइकिल ठीक करवा दो ना।”
“इस बार के मेले में मैं तुम्हें नई साइकिल दिला दूँगा।”

“सच में, पापा?” टीनू मुस्कुराया।
सोहन ने टीनू का कान खींचते हुए कहा, “मत देना पापा, इसे रोज़ कुछ नया चाहिए! और तेरे पास खिलौनों की कमी है क्या?”
“टूटे हुए हैं… और वो सारे मैंने खुद ढूँढे हैं!” टीनू मुँह बनाते हुए अंदर चला गया।
“माँ, मैं कह रहा हूँ, इसके बहुत नखरे हैं आजकल,” सोहन बोला।
उनकी माँ, जो अपने आँसू दबाए चुपचाप रोटी बना रही थीं, ने हाँ में गर्दन हिला दी।

अगले दिन…
टीनू की किसी आवाज़ से आँख खुली। उसने देखा कि माँ और भाई काम पर चले गए थे।
टीनू ने रोज़ की तरह पहले अपने खिलौने देखे, फिर बाहर आया।
उसे दिखा कोई आ रखा था — राजू के पापा थे।

“यशोधरा ने तो कुछ नहीं खाया कल से, बस रोए जा रही है… अब क्या होगा भाई साहब?”
“क्या कहें, भगवान ऐसी चीज़ किसी को ना दिखाए।”

टीनू को कुछ समझ नहीं आया तो वो वहाँ से निकल गया और राजू के पास पहुँचा।
राजू बहुत थका हुआ लग रहा था।
“तुझे क्या हुआ?”
“पता नहीं… गला भारी-सा लग रहा है। यहाँ भी मैं भागकर आया हूँ। मम्मी ने कहा घर से बाहर मत जाना, आराम कर, लेकिन मुझे नहीं करना।”
फिर राजू ने आगे कहा, “तू इस बार मेले से क्या लेगा?”
“मुझे तो पापा नई साइकिल दिला रहे हैं,” टीनू बोला।
“और तू?”
“मुझे तो वो लकड़ी वाली रेलगाड़ी चाहिए, वही हरे और लाल रंग वाली। इस बार के मेले से वही लूँगा।”
“तो चल तेरे पापा से बात करते हैं।”

ऐसा कहकर वो दोनों राजू के घर की तरफ चले गए।
राजू को देखते ही उसकी माँ चिल्लाने लगी, “कहाँ था तू? तुझे आराम करने को कहा था ना, दवाई भी नहीं ली!”
राजू अपने पापा के पास गया, “पापा, मुझे इस बार मेले से वो लकड़ी की रेलगाड़ी चाहिए, दिला दोगे क्या?”

यह सुनकर राजू के पापा उदास हो गए, “मेले में तो अभी बहुत दिन हैं, बेटा।”
“उससे क्या होता है, आप दिला दोगे ना?”
“कुछ नहीं मिलेगा, तू अंदर जाकर आराम कर।” राजू की माँ ने कहा।
“नहीं, मैं टीनू के साथ बाहर खेलने जाऊँगा।”
“कहीं नहीं जाएगा।”
ऐसा कहकर राजू की माँ उसे अंदर ले गईं।

इससे टीनू भी उदास हो गया और अपने घर की तरफ चला आया।
“ये यशोधरा मौसी भी ना, हमेशा डाँटती रहती हैं,” टीनू ने अंदर जाते हुए कहा।
यह सुनकर कमला बोलीं, “क्या हुआ उन्हें, वो ठीक हैं?”
“उन्हें क्या होना था, उन्होंने राजू को मेरे साथ खेलने नहीं दिया और उसे अंदर बंद कर दिया,” टीनू ने गुस्से में कहा।
“राजू बीमार है, बेटा,” टीनू की माँ ने कहा।
“क्या मतलब बीमार? तो क्या वो अब मेला नहीं देख पाएगा?” टीनू ने मासूमियत से पूछा।
इस पर उसकी माँ ने कुछ नहीं कहा — शायद कह नहीं पाईं।

टीनू फटाफट वहाँ से निकल गया।
वो सीधे राजू के घर गया, चुपके से अंदर चला गया।
उसने देखा कि राजू बिस्तर पर बैठा बहुत कमजोर लग रहा था।
“तू क्या कर रहा है यहाँ?”
“तू बहुत बीमार है क्या?”
“माँ ने कहा कि तू मेला नहीं देख पाएगा।”
“क्यों? फिर मैं वो रेलगाड़ी कैसे लूँगा?” राजू ने कहा।
यह सुनकर टीनू बोला, “वो मैं तुझे लाकर दूँगा।”
“पर वो तो मेले में ही होती है, और मेले को अभी भी पाँच दिन बाकी हैं।”
“तू फिक्र मत कर, मैं ले आऊँगा।”

ऐसा कहते हुए टीनू वहाँ से निकल गया।

गर्म दोपहर में वो चक्कर काट रहा था। उसके पैरों के छाले अब इतने सख्त हो चुके थे कि अब उसे दर्द नहीं होता था।
टीनू एक घर के बाहर रुका, जहाँ से उसे अक्सर अच्छे खिलौने मिलते थे।

टीनू ने दरवाज़ा खटखटाया, एक आदमी ने दरवाज़ा खोला —
“कौन है रे तू?”
“मैं टीनू, मुझे यहाँ जो रहते हैं उनसे मिलना है।”
“मालिक ऐसे किसी से नहीं मिलते, चल जा यहाँ से।”
“मुझे बस पूछना है कि इतने सुंदर खिलौने कहाँ से लाते हैं।”

उस आदमी ने टीनू को गौर से देखा और कहा, “पास के बड़े गाँव की बड़ी दुकान से।”
“बड़ी दुकान से?” टीनू बोला।
“हाँ, वो गाँव यहाँ से दो मील दूर है।”
“पर वो खिलौने बहुत महँगे हैं।”
“कोई बात नहीं, मेरे पास बहुत पैसे हैं।”

ऐसा कहकर टीनू तेज़ी से अपने घर भागा। उसने अपना गुल्लक खोला — उसमें पाँच-छः रुपये थे — वो लेकर बाहर जाने लगा कि तभी माँ ने रोक लिया।
“तू कहीं नहीं जाएगा… अभी रात होने वाली है बस।”

इससे टीनू को रुकना पड़ा। अगले दिन टीनू सुबह-सुबह अपनी टूटी साइकिल लेकर घर से निकल गया।

वो काफी देर तक चलता रहा।
काफी समय बाद वो बड़े गाँव पहुँचा। वहाँ बड़े घर, लंबे रास्ते और ढेर सारी दुकानें थीं।
टीनू हर दुकान में देखने लगा पर उसे वो रेलगाड़ी कहीं नहीं दिखी।
फिर उसकी नज़र एक आदमी पर पड़ी जो सड़क किनारे अपना सामान बेच रहा था —
लकड़ी के ढेरों खिलौने!

टीनू ने वहाँ जाकर देखा तो वही रेलगाड़ी थी — हरे और लाल रंग में।
“मुझे ये रेल चाहिए,” टीनू ने कहा।
उस आदमी ने टीनू की ओर देखा — गर्मी और थकान से उसका चेहरा लाल था।
“हाँ, ला पैसे।”
टीनू ने अपनी जेब से वो सिक्के निकाले।
आदमी बोला, “इतने से क्या मिलेगा लल्ला? इसमें तो गाड़ी का पहिया भी नहीं आएगा।”
“पर ये तो बहुत सारे हैं, मेरे सारे पैसे हैं ये,” टीनू ने कहा।
“पर हैं तो कम, जा भाई, बाकी लोगों को आने दे।”
“पर मुझे ये गाड़ी चाहिए।”
“तो पैसा ला।”
“और तो नहीं है।”
“तो ये नहीं मिलेगी। एक ही है, आज नहीं तो कल बिक जाएगी।”

यह सुनकर टीनू बोला, “मैं ये कल ले जाऊँगा, आप किसी को देना मत।”
ऐसा कहकर टीनू वहाँ से निकल गया।

वो दुकानदार काफी देर तक उसे देखता रहा।

टीनू घर पहुँचा तो देखा कि राजू के पापा फिर आए हुए थे।
पर टीनू सीधे अंदर चला गया — उसे तो और पैसे ढूँढने थे।

“उसे खून की उल्टियाँ शुरू हो गई हैं,” राजू के पापा बोले और रोने लगे।
टीनू के पापा उन्हें संभालने की कोशिश करते रहे।

टीनू ने अपना सारा सामान देखा पर उसे पैसे नहीं मिले।
यहाँ तक कि उसने चुपके से माँ का सामान भी देख लिया, पर वहाँ भी कुछ नहीं था।

फिर टीनू को कुछ और सूझा।

अगले दिन — जब वो उठा — सब लोग कुछ बात कर रहे थे। सोहन भी आज दुकान पर नहीं गया था।
टीनू ने अपने सारे खिलौने, जो उसने इतने समय में जमा किए थे, एक थैले में डाले और बाहर आ गया।
“तू कहाँ जा रहा है? हम सब राजू के घर जा रहे हैं, उसे देखने चल तू भी।” सोहन ने कहा।
“क्यों, क्या हुआ उसे?”
“तू चल एक बार,” सोहन बोला।
“नहीं, मुझे स्कूल में कुछ काम है, आप सब जाओ।”
ऐसा कहकर टीनू तेज़ी से वहाँ से निकल गया।

वो खिलौनों का थैला लिए उस दुकान पर पहुँचा।
दुकानदार बोला, “देख लल्ला, तेरे लिए मैंने कल वो गाड़ी बेची नहीं है, आज पैसे तो लाया है ना?”
“नहीं, पैसे तो नहीं… पर—”
ऐसा कहकर टीनू ने सारा थैला वहाँ उलट दिया।

दुकानदार ने देखा — वहाँ बहुत सारे छोटे-बड़े खिलौने थे, सब टूटे-फूटे मगर सुंदर।
“ये क्या है?”
“आप ये सब रख लो और मुझे वो गाड़ी दे दो।”
“ऐसा नहीं होता लल्ला, मैं भला इन पुराने खिलौनों का क्या करूँगा?”
“ये मैंने कचरे से ढूँढ-ढूँढकर इकट्ठे किए हैं। बहुत पसंद हैं मुझे। पर अब मुझे वो रेलगाड़ी चाहिए। मेरा दोस्त मेला नहीं जा पाएगा, तो मुझे वो उसे देनी है।”

यह सुनकर दुकानदार ने टीनू को देखा — नंगे पैर, तपती रेत पर खड़ा, आँखों में उम्मीद।
उसने टीनू के सिर पर हाथ रखा और कहा,
“जा ले जा, तु ये गाड़ी। तेरे खिलौने इस गाड़ी से ज़्यादा सुंदर और कीमती हैं।”

यह सुनकर टीनू खुशी से नाचने लगा।
उसने वो गाड़ी ली और अपनी साइकिल पर बैठ गया।
पर जैसे कि साइकिल खराब थी, उसे बहुत वक़्त लगा।

टीनू राजू के घर की तरफ भागा।
पर जैसे ही पहुँचा, देखा — वहाँ बहुत लोग इकट्ठा थे।
हर तरफ रोने-चिल्लाने की आवाज़ें गूँज रही थीं।
टीनू ने आगे जाकर देखा — राजू चारपाई पर लेटा था, और सब लोग उसे घेरे हुए थे।

टीनू ने चारपाई के पास खड़े होकर कहा,
“राजू… देख, मैं तेरे लिए क्या लाया हूँ! अब तुझे मेले का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है… राजू…”

यह सुनकर सोहन ने रोते हुए टीनू को गले लगा लिया।
टीनू ने राजू के चेहरे को देखकर कहा,
“राजू… देखा ना, मैं क्या लाया — लकड़ी वाली रेलगाड़ी, हरे और लाल रंग की…”

ऐसा कहते हुए टीनू ने उस रेलगाड़ी को अपने सीने से लगा लिया।

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