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उम्मीद की खिड़की
4 अप्रैल 2001 ये कहानी शुरू होती है अंत से,अंत एक रिश्ते का,अंत उस रिश्ते में बसे प्यार का। उस रोज़ सिर्फ़ प्राचीता ही नहीं टूटी,बराबर हिस्सों में उसका दिल भी टूटा। नौकरी के चलते अभिजीत को शहर छोड़कर जाना पड़ा,उस वक़्त में मोबाइल इतने प्रचलित तो थे नहीं,और न “लॉन्ग डिस्टेंस” नाम की चीज़ थी। “अब कब मिलोगे?”प्राचीता ने पूछा। “बहुत जल्द…..” ये कहकर अभिजीत ने एक उम्मीद दी कि शायदवो फिर मिल पाएँ। पर काम और ज़िम्मेदारियों में उलझा इंसानपतंग की तरह हो जाता है,जिसका एक सहारा तो होता है,पर वो वहाँ वापस जा नहीं पाता है…समाज का हिस्सा हो जाने के बाद समय मिलता कहाँ है? “समय…
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मन – एक चोर
चारपाई की बांई ओर कमल परेशान सा बैठा है। जाहिर है कि अभी तक उसने नाश्ता नहीं किया। भरत, दुकान पर जाने के लिए तैयार है।अभी तक उसने बाल नहीं बनाये हैं या शायद उनके बीच अचानक से शुरू हुई बात ने किसी और चीज का मौका ही नहीं दिया। “तुम पागल हो, 60 हज़ार के गहने कोई मामूली चीज़ नहीं है। जीवन में ऐसे मौके बार-बार नहीं आते।”भरत कमल के मन में उन गहनों को लेकर लालसा जगाने की कोशिश करता है। “पर वह गहने रोशनी की माँ ने मुझे बड़े विश्वास के साथ दिए हैं ” कमल कहता है। “मैं ऐसे किसी का विश्वास नहीं तोड़ूंगा।” दरअसल रौशनी…


