सबसे सुंदर दुल्हन
वक्त रहते देख लो फिर मत कहना कि देखने नहीं दी, नंदिनी ने अपने हाथों को आगे बढ़ाते हुए कहा —
राजीव ने हाथो को पकड़ते हुए गौर से सारी लगी मेहँदी को देखा जो पूरे हाथ को और भी सुंदर बना रही थी।
राजीव को नंदिनी के मिट्टी से सने हाथ याद आए जब राजीव ने बारिश में उसे कीचड़ में गिरा दिया था।
नंदिनी ने हाथ पीछे खींचते हुए कहा, “कैसी लग रही है, नजर मत लगा देना।”
राजीव ने मुँह बनाते हुए कहा, “इतनी भी अच्छी नहीं है, देख तो ! ढँग से रंग ही नहीं आया, वो प्यार नहीं करता तुझसे।”
ऐसा कहते हुए राजीव आगे चलने लगा।
“ओह आया बड़ा — कितनी सुन्दर तो लग रही है। चलो अब मैं जा रही हूँ, घर पर काम है मुझे बहुत…”
नंदिनी ने आगे जाते हुए कहा।
“अरे सुनो, जलेबी खाओगी?” राजीव ने आवाज़ लगाते हुए कहा।
“पैसे तुम दे रहे हो तो हाँ…”
राजीव हलवाई के पास खड़े होकर जलेबियाँ बनवाने लगा।
नंदिनी पास खड़ी रही।
“सारी तैयारीयां हो गई?” राजीव ने कहा पर उसका ध्यान अभी भी कहीं और था।
“हाँ, सब हो गया। तुम शादी का खाना खा कर देखना — इतना अच्छा होगा, हर तरह की मिठाइयाँ, फल और भी बहुत कुछ, वहां से…” इतना बोलते ही राजीव ने नंदिनी के मुँह में जलेबी ठूँसते हुए कहा, “इस जैसा कुछ नहीं है।”
नंदिनी ने मुँह बना लिया और वे दोनों चुपचाप आगे चलने लगे।
“मैं तो नहीं आऊँगा शादी में।”
“क्यों…तुम क्यों नहीं आओगे?”
“तुम कितनी बुरी लगोगी…मैं तो देख ही नहीं पाऊँगा, मेरे बाकी दोस्त क्या कहेंगे, कितनी बुरी दिखती है तुम्हारी दोस्त।”
“आह , देखो तो — खुद को क्या समझते हो जैसे! चुपचाप आ जाना” नंदिनी ने अपनी घर की गली की तरफ मुड़ते हुए कहा।
“आ जाना और देखना — मैं दुनिया की सबसे सुन्दर दुल्हन लगूँगी, सबसे ज़्यादा…”
नंदिनी चली गई।
राजीव वहीं खड़ा रहा, इतना सन्नाटा पर इतना बड़ा तूफ़ान । जैसे अभी-अभी उसके आँखों से किसी ने उसकी रोशनी छीन ली हो, जैसे अब उसका दिल अगली धड़कन नहीं लेने वाला है।
राजीव अपने बचपन से स्कूल तक के समय को सोचने लगा — होली की शरारतें, स्कूल की मस्ती — पर तभी जैसे हकीकत ने उसे जोर का धक्का मारा हो और आज वह यहाँ खड़ा है जहाँ अब सब बदल रहा है।
राजीव धीरे-धीरे वहाँ से अपने घर की तरफ चला गया, तभी मोहन ने उसे पकड़ते हुए कहा, “अरे साहब क्या हाल है, ऐसे कहाँ जा रहे हो?”
“घर ही जा रहा हूँ।”
“अरे चलो हमारे साथ, हम सिनेमा चलें फिल्म देखने।”
“नहीं, तुम जाओ, मुझे आज तबियत कुछ सही नहीं लग रही है।”
यह सुनकर मोहन ने राजीव के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “शादी में तो जाओगे न? डॉक्टर साहब ढूँढ रहे थे तुम्हें कि राजीव एक दिन भी घर नहीं आया, हमें तो लगा था वही सारा काम संभालेगा नंदिनी की शादी का।”
इस पर राजीव ने कुछ नहीं कहा।
यह देखकर मोहन ने राजीव को झनझोरते हुए कहा, “यार क्या हुआ है, कुछ बोलता क्यों नहीं है, मुझे बता…”
यह सुनकर राजीव ने मोहन की तरफ देखा — इतना अँधेरा और इतनी उदासी किसी इंसान को मार सकती थी जितनी इस वक्त राजीव की आँखों में दिख रही थी।
यह देखकर एक हद तक मोहन डर गया, उसने कहा, “अब आगे का देखना होगा, सोचो उसे कैसा लगेगा अगर तू न गया तो, और बाकी सब क्या सोचेंगे, तुम दोनों के रिश्ते को लेकर लोग बातें करेंगे। वह अपनी ज़िन्दगी शुरू कर रही है अब नए ढंग से, नए लोगों के साथ। विवेक बुरा लड़का तो नहीं है, मैं उससे मिल चुका हूँ — सारी चीजें छोड़ और एक बार नंदिनी का ज़रूर सोच लेना।”
ऐसा कहकर मोहन आगे चल गया।
राजीव ने एक गहरी साँस ली और वह आसमान की तरफ देखने लगा जैसे उसने जो यहाँ खो दिया है वह वहाँ उसे शून्य में मिल जाएगा; पर ऐसा होता कहाँ है — एक बार खो चुकी चीज़ जमीं, आसमान तो क्या, जन्मों तक भी नहीं मिलती। यह बात राजीव भी अच्छे से समझता था।
……… ………… …………
सभी लोग सज़-धज़ कर शादी में पहुँचे, फूलों और मिठाइयों की खुशबू कई गल्लियों तक जा रही थी। शादी के गीतों ने पूरे घर को नई जान दे रखी थी। नंदिनी सुबह से ही तैयार होने को बैठी थी पर कुछ भी उसे अच्छा नहीं लग रहा था; सब ने बलायें ले लेकर कह दिया कि तुझसे सुंदर कौन है, पर उसे राजीव की बात याद आ रही थी और उसे और भी सुंदर लगना था।
चूड़ियाँ पहनते हुए नंदिनी ने मेहँदी की तरफ देखा और खुद से कहा, “अच्छी तो लग रही है, कुछ भी।”
फिर उसने शोभा को बुलाते हुए कहा, “राजीव आ गया क्या?”
“नहीं, मैंने तो देखा नहीं है, बाकी सब यहीं हैं — मोहन, प्रदीप कहों तो अंदर बुला लूँ।”
“हाँ, अभी नहीं।” ऐसा कहते हुए नंदिनी ने शीशे की तरफ देखा और कहा, “देखो यह चूड़ियाँ कैसे लग रही हैं, बिंदी तो सही है न, और ये बाल ऐसे कैसे बना दिए हैं, ये पायल ज्यादा भारी तो नहीं है ना?”
शोभा ने कहा, “हाँ भाई, सब सही है।”
“सही है तो लग क्यों नहीं रहा है, राजीव कहाँ है?” नंदिनी ने चिल्लाते हुए कहा, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कर रही है, पर उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था।
फिर सारी चीजें शुरू हुईं — मोहन और बाकी सब एक-एक करके उससे मिले, ढेर सारी बातें की। फिर बारात आई तो वे कामों में लगे गए, सारे घर में भागदौड़ शुरू हो गई।
“दुल्हन को फेरों के लिए लाओ।”
पंडित जी के ऐसा कहते ही डॉक्टर साहब ने शोभा और दीपा को कहा और वे अंदर की तरफ चली गईं।
“चलो, हमारी प्यारी दुल्हन, फेरों पर बुलाया है आपको।”
नंदिनी ने एक बार खुद को शीशे में देखा और कहा, “राजीव आ गया क्या?”
“कैसी पागल है, फेरों में सब राह देख रहे हैं और यह राजीव बैठा यहीं दावत में कहीं जलेबी ठूँस रहा होगा।”
“नहीं, पहले राजीव को बुलाओ वरना मैं नहीं जाती…”
“ऐसे कैसे नहीं जाएगी आप? अब तो बारात आ गई है।” यह सुनकर नंदिनी ने पीछे देखा — वहाँ दरवाजे पर राजीव खड़ा था।
जाने क्यों राजीव को देखते ही नंदिनी का जी भरकर रोने का मन हुआ, पर उसने गुस्से और चिढ़ में कहा, “लो जी, अब आ रहे हैं जनाब, कुछ काम है कि नहीं तुम्हारा यहां?, मैं भी देखना तुम्हारी शादी में हाथ भी हिला दूँ तो?”
“अरे भाई, गुस्सा क्यों कर रही हो — हलवाई ढंग से काम तो कर रहे हैं या नहीं, यही देख रहा था, कहीं घी की जगह तेल तो नहीं पड़ रहा है,” राजीव ने हँसते हुए कहा।
“अब बताओ कैसे लगते हैं हम? अब बताओ क्या कहना है।”
नंदिनी ने गुरुर में आते हुए कहा, जैसे सुबह से राजीव के लिए ही तैयार हो रही हो।
राजीव ने उसे एक बार फिर गौर से देखा — जो वह यहाँ आने के बाद कई बार कर चुका था।
“अब क्या बताऊँ, वह ठीक है — कोई तुमसे शादी तो कर रहा है वरना क्या पता तुम्हें हमेशा यहीं रहना पड़ता।”
नंदिनी ने चिढ़कर कहा, “ढंग से सच कहो…”
इतने में नंदिनी की माँ ने अंदर आकर कहा, “भाई तुम लोगों की वाह ही है, यहाँ बातें करने को भेजा था क्या? पंडित जी और बाकी सब कब से राह देख रहे हैं… चुनी सही करो और चलो।”
शोभा ने नंदिनी को आगे चलने को कहा, नंदिनी ने आगे जाते हुए राजीव की तरफ देखा — राजीव ने होठों ही होठों में कुछ फुसफुसाया जो नंदिनी को समझ नहीं आया, पर राजीव की आँखों में एक अलग ही शांति थी, जैसे किनारे को छूकर जब एक नाव अपनी नई मंजिल पर जाती है तो किनारा शांत हो जाता है; अब पता नहीं वह नाव से बिछड़ने का दुःख है या किनारा अब खत्म हो चुका है।
नंदिनी शोभा और दीपा बाहर चली गईं।
नंदिनी की माँ ने राजीव की तरफ देखकर कहा, “अच्छा हुआ तुम आ गये बेटे, अब खाना वगरह खा कर ही जाना, और विदाई तक रुकना।”
ऐसा कहकर वह बाहर चली गई।
राजीव वहीं खड़ा रहा जब तक नंदिनी पूरा गलियारा नहीं पार कर गई — वह उसे देखता रहा।
उसकी गाल पर से एक आँसू ढलक गया।
“विदाई… वो तो हो गई माँ जी।”
मोहन ने दुकान पर बैठते हुए कहा, “भाई यह शादी ब्याह का काम, कमर ही टूट जाती है — एक चाय बना दो मिश्रा जी।”
वहाँ उसने राजीव को बैठा देखा।
मोहन ने उसके पास बैठकर कहा, “दो चाय बना दो मिश्रा जी।”
राजीव ने पूछा, “सब सही से हो गया क्या?”
“हाँ सब सही से हो गया, अभी 11 बजे है, कल सुबह 8 बजे तक नंदिनी और वहाँ पहुँच जाएँगे।”
“अच्छा,” राजीव ने ऐसे कहा जैसे वह सुन ही नहीं रहा था।
“तू तो गया नहीं था,” मोहन ने चाय लेते हुए कहा।
“गया था मैं।”
“गया था? चलो फिर तो बहुत अच्छा है — नंदिनी को भी अच्छा लगा होगा।” मोहन ने चाय की चुस्की लेकर आगे कहा, “तूने देखा नंदिनी को, कैसी लग रही थी?”
यह सुनकर राजीव वहाँ से खड़ा हो गया।
“दुनिया की सबसे सुंदर दुल्हन, सबसे ज़्यादा…
“सुन्दर, बहुत ज़्यादा…”
राजीव ने चाँद की तरफ देखा, जो किसी भी वक्त बादलों में छुप कर राजीव से आँखें चुरा लेगा, और उसे पता भी नहीं चलेगा कि उसका उजाला एक बार फिर चला गया है, उससे बहुत दूर………






2 Comments
Prachita Tomar
True love kabhi kabhi bas yaadon mein hi zinda rehta hai. Hope so next life me Rajeev ko Nandini mil jaaye🙂
Poonam Giri
🌸🌸🌸🌸